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तीन दिन में सरगुजा: गुफाएँ, मंदिर, राजमहल और मैनपाट

अंबिकापुर से सरगुजा घूमने का दिन-ब-दिन प्लान: माँ महामाया मंदिर, सरगुजा पैलेस, रामगढ़ की 2,000 साल पुरानी गुफाएँ, सतमहला, मैनपाट और तातापानी के गर्म कुंड।

भारत में ऐसी जगहें कम हैं जहाँ थोड़ी-सी दूरी में इतना इतिहास मिल जाए। अंबिकापुर से एक-दो घंटे के सफ़र में आप दो हज़ार साल से भी पुरानी चट्टानों में कटी गुफाएँ देख सकते हैं, मध्यकालीन मंदिरों के अवशेषों के बीच घूम सकते हैं, सरगुजा के राजाओं का महल देख सकते हैं, और उस ठंडे पठार पर दोपहर बिता सकते हैं जहाँ 1960 के दशक से तिब्बती परिवार रहते हैं।

यह गाइड इसे एक आसान प्लान में बदलती है: तीन दिन, एक ठिकाना, और तातापानी के गर्म कुंडों के लिए एक वैकल्पिक चौथा दिन।

पहले थोड़ा इतिहास

अंबिकापुर का नाम देवी अंबिका के नाम पर है, जिन्हें यहाँ माँ महामाया के रूप में पूजा जाता है। तीन सौ से ज़्यादा सालों तक यह शहर सरगुजा रियासत की राजधानी रहा, जब तक 1948 में रियासत भारतीय संघ में शामिल नहीं हुई। आसपास की जंगली पहाड़ियाँ इससे भी कहीं पुरानी कहानियाँ समेटे हैं। स्थानीय मान्यता रामगढ़ की पहाड़ियों को श्रीराम के वनवास से जोड़ती है, और महाकवि कालिदास से भी, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने यहीं मेघदूत की कल्पना की थी।

इलाके का आनंद लेने के लिए यह सब जानना ज़रूरी नहीं, पर जानकर हर पड़ाव और भी ख़ास लगता है।

कब जाएँ

  • अक्टूबर से मार्च सबसे आरामदायक समय है। साफ़ और ठंडे दिन गुफाओं और रामगढ़ की चढ़ाई के लिए बढ़िया हैं।
  • जुलाई से सितंबर बरसात का मौसम है। मैनपाट सबसे हरा-भरा होता है और झरने पूरे उफान पर, पर रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं।
  • चैत्र और शारदीय नवरात्रि में महामाया मंदिर में बहुत भीड़ रहती है। इन दिनों के लिए कमरा पहले बुक करें।
  • दशहरा साल का अकेला दिन है जब सरगुजा पैलेस आम लोगों के लिए खुलता है।
  • मकर संक्रांति (जनवरी के मध्य) में तातापानी का बड़ा मेला लगता है।

पहला दिन: अंबिकापुर का मंदिर और महल

माँ महामाया मंदिर

दिन की शुरुआत शहर की पूर्वी पहाड़ियों पर बने मंदिर से करें, धूप तेज़ होने से पहले। मौजूदा मंदिर का श्रेय सरगुजा के महाराजा रघुनाथ शरण सिंहदेव को दिया जाता है। स्थानीय मान्यता है कि देवी का धड़ यहाँ विराजमान है और शीश रतनपुर के महामाया मंदिर में, इसीलिए कई श्रद्धालु दोनों मंदिरों के दर्शन करते हैं। ठीक सामने समलेश्वरी देवी का छोटा मंदिर है।

सरगुजा पैलेस

मंदिर से शहर की ओर सरगुजा पैलेस जाएँ, जिसे रघुनाथ पैलेस भी कहते हैं। यह पूर्व राजपरिवार का सफ़ेद, दो-मंज़िला महल है। ज़्यादातर दिनों में इसे केवल बाहर से देखा जा सकता है। दशहरे के दिन पुरानी परंपरा के अनुसार महल के दरवाज़े खुलते हैं और राजपरिवार के सदस्य लोगों से मिलते हैं। इस परंपरा के लिए पूरे ज़िले से लोग आते हैं।

शाम: झील पर सूर्यास्त देखने होटल लौटें, और नीचे हमारे शुद्ध शाकाहारी अथर्व रेस्टोरेंट में रात का खाना खाएँ।

दूसरा दिन: सतमहला और रामगढ़ की गुफाएँ

आज का रास्ता दक्षिण-पश्चिम में उदयपुर (सरगुजा वाला) की ओर जाता है। सुबह 8 बजे तक निकलें, पानी साथ रखें और अच्छी पकड़ वाले जूते पहनें।

सतमहला, कलचा–भदवाही

अंबिकापुर से लगभग 40 किमी दूर सतमहला (“सात महल”) पुराने मानव-निर्मित तालाबों के पास ईंट और पत्थर के मंदिरों के अवशेषों का समूह है। यह नाम यहाँ सबसे पहले मिले सात मंदिरों से पड़ा; बाद की खुदाई में और भी मंदिर मिले हैं, और इस समूह को आमतौर पर लगभग 8वीं से 12वीं सदी का माना जाता है। मंदिरों के द्वारों पर बनी नक्काशीदार आकृतियाँ ज़रूर देखें।

रामगढ़ पहाड़ी: सीताबेंगरा और जोगीमारा

आगे रामगढ़ की पहाड़ियों तक जाएँ, जो अंबिकापुर से लगभग 45–50 किमी दूर हैं। पक्का रास्ता जंगल से होकर ऊपर दो गुफाओं तक जाता है, जिन्हें लगभग ईसा पूर्व तीसरी–दूसरी सदी का माना जाता है।

  • सीताबेंगरा चट्टान में कटी है, जिसमें ऊँचे फ़र्श के सामने चट्टान की सीढ़ीनुमा बैठकें बनी हैं। इसी बनावट की वजह से इसे अक्सर भारत की सबसे पुरानी नाट्यशालाओं में गिना जाता है, हालाँकि कुछ विद्वान मानते हैं कि यह किसी प्राचीन रास्ते पर विश्राम-स्थल रहा होगा।
  • जोगीमारा पास ही है। इसमें ब्राह्मी लिपि में एक छोटा-सा शिलालेख है और छत पर बहुत पुराने चित्रों के निशान हैं।

परंपरा इस पहाड़ी, जिसे रामगिरि कहा जाता है, को श्रीराम, सीता और लक्ष्मण से जोड़ती है, और कालिदास से भी, जिनके मेघदूत का निर्वासित यक्ष “रामगिरि” से अपनी प्रिया को संदेश भेजता है। कवि सचमुच यहाँ आए थे या नहीं, यह कहना मुश्किल है, पर यहाँ खड़े होकर समझ आता है कि यह कहानी क्यों टिकी रही।

पहाड़ी पर दो से तीन घंटे रखें। देर दोपहर तक आप अंबिकापुर लौट आएँगे।

तीसरा दिन: मैनपाट, “छत्तीसगढ़ का शिमला”

मैनपाट अंबिकापुर से लगभग 50–55 किमी दूर, क़रीब 1,000 मीटर की ऊँचाई पर बसा पठार है, जो नीचे के शहर से साफ़ ठंडा रहता है। 1960 के दशक में यहाँ तिब्बती शरणार्थियों को बसाया गया था, और उनकी बस्ती, मठ और प्रार्थना-ध्वज इस पठार को एक अलग ही रंग देते हैं। यहाँ बुने ऊनी कालीन और चटाइयाँ अच्छी यादगार बनती हैं।

दिन भर इन जगहों पर घूमें:

  • बौद्ध मंदिर और तिब्बती कैंप, शांत और रंग-बिरंगे।
  • टाइगर पॉइंट, चट्टानी किनारे से गिरता झरना, बरसात के बाद सबसे सुंदर।
  • उल्टा पानी, जहाँ पानी ऊपर की ओर बहता दिखता है। यह आँखों का भ्रम है, पर बहुत यक़ीन दिलाने वाला।
  • जलजली, ज़मीन का ऐसा हिस्सा जो पैरों के नीचे स्पंज की तरह उछलता है।

नवंबर से फ़रवरी तक एक गर्म कपड़ा साथ रखें।

वैकल्पिक चौथा दिन: तातापानी के गर्म कुंड

पड़ोसी बलरामपुर ज़िले का तातापानी थोड़ा लंबा सफ़र है: अंबिकापुर से रामानुजगंज की ओर NH-343 पर लगभग 95 किमी। यहाँ ज़मीन से गर्म पानी निकलकर छोटे कुंडों और नालियों में बहता है, और पास ही एक शिव मंदिर है। मकर संक्रांति के आसपास यहाँ तीन दिन का बड़ा मेला लगता है, जब यह जगह श्रद्धालुओं और दुकानों से भर जाती है। आने-जाने के लिए पूरा दिन रखें।

पूरा प्लान एक नज़र में

दिन कहाँ कितना समय ध्यान रखें
1 माँ महामाया मंदिर, सरगुजा पैलेस आधा दिन, शहर में महल अंदर से केवल दशहरे पर खुलता है
2 सतमहला और रामगढ़ गुफाएँ टैक्सी से पूरा दिन चढ़ाई है; सुबह जल्दी निकलें
3 मैनपाट टैक्सी से पूरा दिन पठार पर ठंड; गर्म कपड़ा रखें
4 (वैकल्पिक) तातापानी गर्म कुंड टैक्सी से पूरा दिन मकर संक्रांति पर बड़ा मेला

काम की बातें

  • आना-जाना: ये जगहें दूर-दूर हैं और वहाँ तक सार्वजनिक परिवहन कम है, इसलिए दिन भर की टैक्सी सबसे आसान है। हमारे फ्रंट डेस्क पर पूछें, हम टैक्सी दिलाने में मदद करेंगे।
  • खाना-पानी: इन जगहों के पास विकल्प सादे हैं, इसलिए लंबे दिनों में पानी और नाश्ता साथ रखें, और लौटकर अथर्व में गरम शाकाहारी खाना खाएँ।
  • धरोहर का सम्मान करें: गुफाएँ और मंदिरों के अवशेष संरक्षित स्मारक हैं। चित्रों को न छुएँ और नक्काशी पर न चढ़ें।
  • दूरियाँ इस गाइड में अनुमानित हैं। सड़कें बदलती रहती हैं, इसलिए यात्रा की सुबह रास्ता ज़रूर देख लें।

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